ऐ शहर छोड़ चले अब तुझे, नौकरी की तलाश में हम…
ऐ शहर,
छोड़ चले अब तुझे, नौकरी की तलाश में हम।
बचपन बिताया सुहाना तेरी बाहों में हमने,
अब जवानी में भटकने की बारी आई है।
ऐ शहर, देख अब पेट की लड़ाई है।
नही मिलता यहां हमारा वो गली मोहल्लों का शोर,
यहां तो बस दिन भर लगा होता है काम का जोर,
ऐ शहर, अब पेट की लड़ाई है।
ना वो उतरायणी मेला, ना चैत नवरात्रि का जश्न,
यहा हर सुबह शाम शोर और परेशानी से जंग।
ऐ शहर, देख अब पेट की लड़ाई है।
ना हरेले की बुआई नसीब है ना हरेले की कटाई,
यहां तो राखी में घर आने वालों की भी होती है छटाई।
ऐ शहर, अब पेट की लड़ाई है।
दूर रह जान पाया मां के हाथ का खाना,
जब चंद दिन बिना खाए रहा आना जाना।
लेखक:- दीपांकर भट्ट
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संपादक – फास्ट न्यूज़ उत्तराखण्ड
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