बाबा रामदेव का ‘आयुर्वेदिक हुक्का’ वीडियो वायरल -बंद नाक-खांसी में राहत का दावा, विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
नई दिल्ली। योग गुरु बाबा रामदेव का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में है। वीडियो में वह एक ऐसे ‘आयुर्वेदिक हुक्के’ के बारे में बताते नजर आ रहे हैं, जिसमें तंबाकू के बजाय कुछ आयुर्वेदिक सामग्री के इस्तेमाल की बात कही गई है। रामदेव ने इसे आयुर्वेद के वात, पित्त और कफ यानी त्रिदोष से जोड़ते हुए दावा किया कि इससे बंद नाक खोलने और खांसी जैसी परेशानियों में राहत मिल सकती है।
वीडियो में बताई गई सामग्री और प्रक्रिया
वीडियो में मुलेठी, हल्दी, राई, गाय का घी, काकड़ा सिंगी और देसी कपूर जैसी सामग्री का इस्तेमाल बताया गया है। मुलेठी को थोड़ा कूटकर उसमें गाय का घी मिलाने के बाद हल्दी और राई डालने की बात कही गई है। इसके अलावा हुक्के की प्लेट पर कपूर जलाकर उसके ऊपर काकड़ा सिंगी रखने की प्रक्रिया भी बताई गई है।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर ‘आयुर्वेदिक हुक्के’ को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे पारंपरिक तंबाकू वाले हुक्के से अलग बता रहे हैं, जबकि कई यूजर्स इसके स्वास्थ्य संबंधी दावों की वैज्ञानिक प्रमाणिकता पर सवाल उठा रहे हैं।
बंद नाक और खांसी में राहत का दावा
रामदेव के अनुसार, इस प्रक्रिया से तैयार धुएं या वाष्प को लेने से बंद नाक खुलने और खांसी में राहत मिल सकती है। उन्होंने इसे वात, पित्त और कफ के संतुलन से भी जोड़ा है। हालांकि, इन दावों को चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित उपचार मानने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।
सांस की बीमारी वाले लोग न करें खुद प्रयोग
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी तरह के धुएं को सांस के जरिए अंदर लेना फेफड़ों और श्वसन तंत्र के लिए नुकसानदेह हो सकता है। खासकर अस्थमा, सांस संबंधी बीमारी या लंबे समय से खांसी से परेशान लोगों को बिना चिकित्सकीय सलाह के इस तरह का प्रयोग नहीं करना चाहिए। घरेलू या आयुर्वेदिक उपायों को डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का विकल्प भी नहीं माना जाना चाहिए।
तंबाकू नहीं, फिर भी धुएं को लेकर सवाल
वीडियो में बताए गए तरीके में तंबाकू का इस्तेमाल नहीं किया जाता, इसलिए इसे सामान्य तंबाकू वाले हुक्के से अलग बताया जा रहा है। हालांकि, किसी पदार्थ को जलाकर या गर्म करके उसके धुएं को फेफड़ों तक पहुंचाने के प्रभाव और इस विशेष तरीके की चिकित्सकीय प्रभावशीलता को अलग-अलग देखा जाना जरूरी है।
ऐसे में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस ‘आयुर्वेदिक हुक्के’ को किसी बीमारी का प्रमाणित इलाज मानने के बजाय चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देना ही सुरक्षित विकल्प है।
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