बेटियां बोझ नहीं, बल्कि दो परिवारों की सेतु हैं : मुरली मनोहर श्रीवास्तव

खबर शेयर करें 👉

गंगा, गीता, गायत्री, लक्ष्मी, सरस्वती हैं बेटियां, शक्ति का स्वरुप हैं बेटियांबेटियां ही हमें आगे बढ़ने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। भारत एक ऐसा देश है जो अपनी संस्कृति, अपने रीति रिवाजों के लिये जाना जाता है। कहा जाता है । हमारे देश की भूमि को“भारत माता” कहा जाता है। यहां के लोग अपनी धरती को अपनी मां के समान समझते हैं। महिलाओं को सम्मान देने के मामले में यहां के लोग आज भी पीछे नहीं है।

  नारी मां-बहन-बेटी और ममता की धरोहर है। इसके अनेक रुप और हर रुप में खुद को जिम्मेदारी के साथ स्थापित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। अगर विकास और समृद्धि को गंभीरता से लेना है, तो महिलाओं की हालत बेहतर करनी होगी। भारतीय उपमहाद्वीप की सभ्यता में महिला की अहम भूमिका है। किसी भी खानदान में स्त्री उसकी संस्कृति की रखवाली करती है। अपने माता पिता के घर की संस्कृति वह पति के घर लेकर आती है, वहां की परंपरा में ढल कर फिर अपने नए आदर्शों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संभालकर रखती है। इसलिए भारतीय परंपरा में नारी, सभ्यता और घर- गृहस्थी अक्सर एक सा,थ एक आदर्श महिला की परिभाषा में समाहित हो जाते हैं। दो शताब्दी के अंग्रेजी शासन के दौरान “भारतीय नारी” स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा परिभाषित हुई। अगर भारतीय समाज में पुरुष अंग्रेजी कानून, आदर्श और संस्कृति से जूझ रहे थे, तो उनकी माएं, बहनें और पत्नियां घर पर उनके पुराने आदर्शों को बचाए हुए थीं। 1947 में आजादी पाने तक भारतीय नारी और भारतीय गृहस्थी लगभग पर्यायवाची हो चुके थे।

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  uttarakhand-जंगल में घास काटने गईं दो महिलाओं पर भालू का हमला -दोनों की मौत से मचा कोहराम

बेटियां भी संभाल रही विरासतः

  बेटियां सब के नसीब में कहां होती हैं, वो तो रब का जो घर पसंद आये वहां होती है़ं। बेटियों के प्रति अब समाज का नजरिया बदलने लगा है़ पहले ऐसा नहीं था़ यहीं कारण है कि देश में हर वर्ष 24 जनवरी को गर्ल चाइल्ड डे के रुप में मनाया जाता है। बदलते परिवेश में बेटियां किसी भी क्षेत्र में अब बेटों से किसी भी स्तर पर पीछे नहीं रह गई हैं। कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहां बेटियां अपनी काबिलीयत का लोहा नहीं मनवा रही हैं। तभी तो जो कल तक ये मानते थे कि बेटों से वंश चलता है़ वो भी आज की तारीख में मानने लगे हैं कि हमारी बेटियां भी इसमें अब पीछे नहीं रहीं। देश-दुनिया के उद्योगपतियों से लेकर फिल्मी दुनिया की चकाचौंध तक में बेटियां अपने पिता की विरासत को संभाल रही हैं। देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीं हों या फिर फिल्म अभिनेता जितेंद्र की बेटी एकता कपूर हों ये सब तो महज एक उदाहरण भर है, जिसे समझने की जरुरत है।

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  ज्योलीकोट में जल जनित रोगों की शिकायत पर सांसद अजय भट्ट सख्त -अधिकारियों को दिए तत्काल कार्रवाई के निर्देश

बेटियां बोझ नहीं शक्ति स्वरुपा हैः

  नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा करना,पैर छूकर, उनका पूजन कर व उपहार भेंट कर उनकी पूजा की जाती है,जिन्हें शक्ति कहा जाता है। उस शक्ति को प्रसन्न करने के लिए भक्त पूजा पाठ करते हैं। आज उसी समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराइयां थमने का नाम नहीं ले रही हैं। कन्या दर बढ़ाने के उद्देश्य से ही अब पिछले कुछ वर्षो से 23 सितंबर का दिन बेटी बचाओ दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। बेटी बचाओ दिवस की सार्थकता तभी संभव है, जब समाज कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ हम सब एकजुट होकर लड़ाई लडे़। कन्या भ्रूण का अवैध गर्भपात ससुराल, पति या स्त्री के माता-पिता या परिवार के लोगों के दबाव की वजह से किया जाता है और जिसका मुख्य कारण बेटों की प्राथमिकता होती है। लड़कियों को बोझ, गरीबी, निरक्षरता और महिलाओं के खिलाफ सामाजिक भेदभाव से दूर किया जाना चाहिए।

*दो परिवारों की सेतु हैं बेटियां*

  लड़के की तरह लड़की भी मुट्ठी बांधकर पैदा होती…बेटियां…बेटियां….कमोबेश अब हर घर में बेटियों का सम्मान होने लगा है। जिस घर में बेटी का सम्मान होता है वो घर संपन्न होता है। लड़कियां घर व अपने माता-पिता की इज्जत होती हैं और मान बढ़ाती हैं। जब दूसरे के घर जाती है, उसके बाद भी बहू, पत्नी और मां बनकर अपने घर को संवारती है तथा अपने माता पिता की दी सीख को दूसरे घर तक पहुंचाती हैं। बचपन से तरुणाई अवस्था तक अपने पिता के घर को संभालती हैं तो शादी के बाद अपनी पति के घर को स्वर्ग बनाने में कोई कोताही नहीं बरतती हैं। अपनी निष्ठा को मारकर जहां उन्हें जिम्मेवारी सौंपी जाती है वहां वो अपने कर्तव्य का पालन करनें में किसी प्रकार की चूक नहीं करती हैं। इसलिए इन्हें दो परिवारों के बीच की सेतू कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  uttarakhand-पाटली गांव में गुलदार का हमला -40 वर्षीय महिला घायल, ग्रामीणों में दहशत

  किसी भी बेटी को जो सुकून और प्यार, पिता के पास रहकर महसूस होता है वो किसी और के प्यार से नहीं मिलता। वही उसकी जिंदगी के पहले हीरो होते हैं। आज बेटियां दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर कामयाबी की इबारत लिख रही हैं। शहर में कई ऐसी बेटियां हैं, जो शक्ति का जीवंत प्रतीक हैं और प्रेरणा की मूरत हैं। बेटियां हैं लाख संघर्षों के बाद भी अपनी मुस्कुराहट से समाज को नई दिशा देने की प्रेरणा बनती हैं।

ADVERTISEMENTS

Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad Ad
सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -

👉 फ़ास्ट न्यूज़ के WhatsApp ग्रुप से जुड़ें

👉 फ़ास्ट न्यूज़ के फ़ेसबुक पेज़ को लाइक करें

👉 कृपया नवीनतम समाचारों से अवगत कराएं WhatsApp 9412034119