गिरफ्तारी के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य -अवैध हिरासत पर रिमांड भी हो सकती है खारिज : सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी को बिना उचित कारण निर्धारित समय से अधिक पुलिस हिरासत में रखना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोपी को अनुचित या आवश्यकता से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया है, तो वह पुलिस की ओर से मांगी गई रिमांड को भी खारिज कर सकता है।
यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने सुजीत दास बनाम भारत संघ मामले में सुनाया। यह मामला स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) के तहत दर्ज किया गया था। चार आरोपियों ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी।
मामले के अनुसार, जांच एजेंसी ने चारों आरोपियों को 29 सितंबर 2025 को दोपहर दो बजे हिरासत में लिया था, जबकि दस्तावेजों में उनकी औपचारिक गिरफ्तारी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दर्ज की गई। इस तरह वास्तविक हिरासत और कागजों में गिरफ्तारी के बीच करीब 21 घंटे का अंतर रहा।
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले आरोपियों को लगभग 18 घंटे तक अवैध हिरासत में रखा गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के वास्तविक समय से 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा की गणना की जानी चाहिए और आरोपियों को इसी अवधि के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय का आदेश निरस्त कर दिया और चारों आरोपियों को सशर्त जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। इस फैसले को पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया में जवाबदेही और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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संपादक – फास्ट न्यूज़ उत्तराखण्ड
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