शिक्षा के नाम पर ‘लूट’ का खुला खेल: हल्द्वानी में निजी स्कूलों और बुक डिपो की सांठगांठ आई सामने
हल्द्वानी: शिक्षा जैसे पवित्र पेशे को व्यापार बनाने में निजी स्कूल कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड स्थित एक नामी बुक डिपो की पर्ची से सामने आया है, जो निजी स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच के गहरे ‘कमीशन खेल’ की पोल खोल रहा है।

पर्ची पर स्कूल का नाम: मनमानी का पुख्ता सबूत
सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर वायरल हो रही इस पर्ची में स्पष्ट रूप से ‘वर्धमान बुक डिपो’ का नाम छपा है और नीचे पेन से स्कूल का नाम ‘Little Sparkle Academy’ लिखा गया है। पर्ची पर साफ लिखा है कि “इस स्कूल की समस्त पुस्तकें मिलने का एकमात्र स्थान” यही दुकान है। यह सीधे तौर पर प्रशासन के उन आदेशों की धज्जियां उड़ाना है, जिसमें कहा गया था कि स्कूल किसी एक दुकान से किताब खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।

एलकेजी की किताबों का दाम 1800 के पार
अभिभावकों ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि नर्सरी और एलकेजी जैसी छोटी कक्षाओं के बच्चों का बुक-सेट 1700 से 1800 रुपये तक मिल रहा है। इसके अलावा भारी-भरकम एडमिशन फीस और अन्य शुल्कों ने मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी है। एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
“हमें स्कूल से सीधे तौर पर इस खास बुक डिपो पर जाने को कहा गया। जब हमने बाजार में दूसरी जगह किताबें ढूंढी, तो वे उपलब्ध ही नहीं थीं। यह मजबूरी का फायदा उठाने जैसा है।”
‘दोनों हाथ घी में, सिर कढ़ाई में’
प्रशासन की सख्ती के बावजूद स्कूल संचालकों के हौसले बुलंद हैं। यह स्थिति उस कहावत को चरितार्थ करती है कि “दोनों हाथ घी में और सिर कढ़ाई में”। एक तरफ स्कूलों को मोटी फीस मिल रही है, तो दूसरी तरफ बुक डिपो से मिलने वाला मोटा कमीशन उनकी कमाई को दोगुना कर रहा है। प्रशासन समय-समय पर अभियान चलाने का दावा तो करता है, लेकिन धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है।
मुख्य बिंदु जो व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं:
- एकाधिकार: आखिर क्यों कुछ विशेष प्रकाशकों की किताबें केवल चयनित दुकानों पर ही मिलती हैं?
- बजट से बाहर शिक्षा: क्या एक आम आदमी अब अपने बच्चे को निजी स्कूल में पढ़ाने का सपना भी नहीं देख सकता?
निजी स्कूलों की यह मनमानी न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि अभिभावकों का मानसिक और आर्थिक शोषण भी है। अब देखना यह होगा कि क्या प्रशासन इस वायरल पर्ची का संज्ञान लेकर संबंधित स्कूल और बुक डिपो पर कोई ठोस कार्रवाई करता है या फिर हर साल की तरह इस बार भी अभिभावक इस ‘लूट’ का हिस्सा बनने को मजबूर रहेंगे।
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