उत्तराखंड : लालकुआं में चुनावी तपिश बढ़ी- कांग्रेस में टिकट की दौड़ तेज
–पांच साल बाद सक्रिय हुए दावेदारों पर उठे सवाल, जनता पूछ रही—जो फोन नहीं उठाते, वे जनसमस्याएं कैसे सुनेंगे?
मोटाहल्दू (नैनीताल)। विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। खासकर कांग्रेस में टिकट को लेकर दावेदारों की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। लंबे समय से क्षेत्र में कम नजर आने वाले कई नेता अब चुनावी मैदान में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए सक्रिय हो गए हैं। बैठकों, जनसंपर्क और राजनीतिक गतिविधियों के जरिए टिकट की दौड़ में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि, इन दावेदारियों के बीच क्षेत्र की जनता के बीच एक अहम सवाल भी उठने लगा है कि जो नेता आम लोगों और पत्रकारों के फोन तक उठाने में रुचि नहीं दिखाते, वे चुनाव जीतने के बाद जनता की समस्याओं को किस तरह सुनेंगे?
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि चुनाव नजदीक आते ही कई नेताओं की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। ऐसे में मतदाताओं के बीच यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि जनता के बीच लगातार सक्रिय रहने वाला नेतृत्व कौन है और कौन केवल चुनाव के समय दिखाई देता है।
टिकट की दावेदारी के साथ पांच साल के काम का हिसाब भी जरूरी
लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के संभावित दावेदारों के सामने अब केवल टिकट हासिल करने की चुनौती नहीं है, बल्कि जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करने की चुनौती भी है। मतदाता यह जानना चाहेंगे कि पिछले पांच वर्षों के दौरान क्षेत्र की समस्याओं, विकास कार्यों और जनहित के मुद्दों को लेकर कौन नेता लगातार सक्रिय रहा।
राजनीति में दावेदारी करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन टिकट मांगने वाले नेताओं से जनता उनके पुराने कार्यों और क्षेत्र में उनकी उपलब्धता का हिसाब भी मांग सकती है। चुनावी मौसम में अचानक सक्रिय होने के बजाय पूरे कार्यकाल जनता के बीच रहने वाले नेताओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए—यह मतदाताओं की एक महत्वपूर्ण अपेक्षा हो सकती है।
फोन नहीं उठाने की शिकायत बनी चर्चा का विषय
स्थानीय राजनीतिक हलकों में कुछ नेताओं के फोन नहीं उठाने या आम लोगों तथा पत्रकारों से संपर्क में नहीं रहने को लेकर भी चर्चाएं हैं। सवाल यह है कि यदि कोई नेता चुनाव से पहले ही संवाद से बचता है तो जनप्रतिनिधि बनने के बाद वह जनता की समस्याओं को कितनी गंभीरता से सुनेगा?
बेशक, किसी व्यक्ति के फोन न उठा पाने के कई व्यक्तिगत या व्यावहारिक कारण हो सकते हैं, लेकिन यदि यह लगातार बनी रहने वाली स्थिति है तो राजनीतिक दावेदारों को जनता के साथ संवाद और उपलब्धता को लेकर गंभीरता से विचार करना होगा।
मतदाताओं के पास होगा सबसे बड़ा फैसला
आखिरकार चुनाव में अंतिम फैसला जनता के हाथ में ही होगा। लालकुआं विधानसभा क्षेत्र के मतदाता इस बार भी दावेदारों के राजनीतिक वादों के साथ-साथ उनके पिछले कार्यकाल, क्षेत्र में सक्रियता, जनसंपर्क और जनता के प्रति उपलब्धता को कसौटी पर कस सकते हैं।
चुनावी माहौल में मतदाताओं से भी यही अपेक्षा है कि वे किसी भी दल या नेता के प्रचार से प्रभावित होने के बजाय उसके पिछले पांच वर्षों के काम, जनता के बीच उसकी मौजूदगी और समस्याओं के समाधान के प्रयासों को देखकर अपना निर्णय लें। क्योंकि मतदान केवल एक दिन का फैसला होता है, लेकिन उसका असर पूरे पांच साल तक क्षेत्र के विकास और जनता की समस्याओं पर पड़ सकता है।
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संपादक – फास्ट न्यूज़ उत्तराखण्ड
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