स्थायी राजधानी और मूल निवास के मुद्दों पर छाया सत्र, विधायकों में नोकझोंक

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देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा के तीन दिवसीय विशेष सत्र में स्थायी राजधानी, मूल निवास और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे मुद्दे हावी रहे। इन पर चर्चा के दौरान कई बार सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली।

राज्य स्थापना की रजत जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित यह विशेष सत्र बुधवार को संपन्न हुआ।

किच्छा से कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहड़ ने कहा कि “पहाड़ों से सबसे अधिक पलायन नेताओं का हो रहा है। विधायक और मंत्री देहरादून या हल्द्वानी में मकान बना लेते हैं, ऐसे में पहाड़ का विकास कैसे होगा?” उन्होंने सुझाव दिया कि देहरादून में पहले से अरबों रुपये की लागत से बना ढांचा और बड़ी संख्या में कार्यरत कर्मचारी होने के कारण देहरादून को ही स्थायी राजधानी घोषित किया जाए।

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गैरसैंण को लेकर उन्होंने कहा कि उसे ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में और अधिक विकसित किया जाना चाहिए तथा वहां के मार्गों और सुविधाओं को बेहतर बनाया जाना चाहिए।

बेहड़ ने यह भी प्रस्ताव रखा कि राज्य गठन (9 नवंबर 2000) के समय से यहां निवास कर रहे सभी लोगों को राज्य का मूल निवासी माना जाए, जिससे इस विषय पर बार-बार उठने वाला विवाद समाप्त हो सके।

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उनके इस सुझाव का धर्मपुर से भाजपा विधायक विनोद चमोली सहित सत्ता पक्ष के कुछ सदस्यों ने विरोध किया, जिसके चलते सदन में कुछ समय के लिए तीखी बहस हुई।

विकासनगर से भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने मूल निवास के मुद्दे पर कहा कि जौनसार क्षेत्र की जनसांख्यिकी कड़े भू-कानूनों के कारण अप्रभावित रही है। उन्होंने कहा कि सरकार प्रदेश के मौलिक स्वरूप से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होने देगी।

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी सत्र के दौरान कहा कि “देवभूमि उत्तराखंड के मूल स्वरूप को किसी भी कीमत पर बदला नहीं जाने दिया जाएगा।” उन्होंने कहा कि राज्य की संस्कृति और पहचान को बचाए रखने के लिए ‘लैंड जिहाद’, ‘लव जिहाद’ और ‘थूक जिहाद’ जैसे कृत्यों पर सख्त कार्रवाई की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि तीन दिवसीय विशेष सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने विधानसभा को संबोधित किया था।

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