77वें गणतंत्र दिवस पर ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष का भव्य उत्सव

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नयी दिल्ली, 26 जनवरी। देश के 77वें गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ और उसके आसपास कलाकार तेजेंद्र कुमार मित्रा द्वारा बनाए गए भव्य चित्रों के माध्यम से ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती छंदों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। इन चित्रों में उस युग की देशभक्ति और सांस्कृतिक चेतना की स्पष्ट झलक दिखाई दी।
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 1875 में रचित ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांति का प्रेरक नारा बना और वर्ष 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।


इस वर्ष ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ 77वें गणतंत्र दिवस परेड का प्रमुख विषय रही।
गणतंत्र दिवस के औपचारिक निमंत्रण पत्रों पर भी ‘वंदे मातरम @150’ का लोगो अंकित किया गया है, जिसमें बंकिम चंद्र चटर्जी का छायाचित्र और गीत का वॉटरमार्क शामिल है।

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भारत आज 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नेतृत्व में राजधानी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर मुख्य समारोह आयोजित किया गया। गणतंत्र दिवस परेड राष्ट्रीय एकता का सशक्त प्रतीक है, जो देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता, तकनीकी प्रगति और राष्ट्रीय एकता को दर्शाती है।


इस वर्ष गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।

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परेड के दौरान कर्तव्य पथ पर कुल 30 झांकियां प्रस्तुत की गईं, जिनमें 17 झांकियां विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की तथा 13 झांकियां मंत्रालयों और सेवाओं से संबंधित रहीं।


इन झांकियों का व्यापक विषय ‘स्वतंत्रता का मंत्र: वंदे मातरम’ और ‘समृद्धि का मंत्र: आत्मनिर्भर भारत’ रहा, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्षों और आत्मनिर्भरता के माध्यम से देश की प्रगति को दर्शाया गया।


‘वंदे मातरम’ को पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था, जबकि 7 अगस्त 1905 को इसका प्रयोग पहली बार राजनीतिक नारे के रूप में किया गया। बाद में इसे बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास आनंदमठ (1882) में शामिल किया गया।

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गत वर्ष 7 नवंबर को ‘वंदे मातरम’ की 150वीं वर्षगांठ मनाई गई थी। ‘मां, मैं तुम्हें प्रणाम करता हूं’ का भाव समेटे यह राष्ट्रीय गीत स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्र निर्माताओं की पीढ़ियों को प्रेरित करता रहा है और आज भी भारत की राष्ट्रीय पहचान और सामूहिक चेतना का अमिट प्रतीक बना हुआ है।


‘वंदे मातरम’ भारत की सभ्यतागत, राजनीतिक और सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग है। इसकी 150वीं वर्षगांठ का यह अवसर देशवासियों के लिए एकता, बलिदान और भक्ति के शाश्वत संदेश को पुनः स्मरण करने का प्रतीक है।

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