हाईकोर्ट का अहम फैसला : सरकारी मंजूरी के बिना ड्यूटी के दौरान कार्रवाई करने वाले अधिकारियों पर नहीं चलेगा मुकदमा
-अतिक्रमण हटाने के दौरान मारपीट के आरोप में जारी समन निरस्त रखने का आदेश बरकरार
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कथित अपराधों के मामले में लोक सेवकों के खिलाफ अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति आवश्यक हो सकती है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की एकलपीठ ने इस आधार पर बनभूलपुरा, हल्द्वानी निवासी मोहम्मद अरशद अय्यूब की याचिका खारिज कर दी।
मामला 16 जनवरी 2017 का है। हल्द्वानी के गफूर बस्ती और बनभूलपुरा क्षेत्र में हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में रेलवे और वन विभाग की भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा रही थी। इसी दौरान हुई झड़प में शिकायतकर्ता का पैर टूट गया था। इसके बाद उसने संबंधित अधिकारियों पर मारपीट करने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया था।
मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम), नैनीताल ने 10 अगस्त 2017 को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 324, 504 और 506 के तहत समन जारी किए थे। हालांकि, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, नैनीताल ने 24 नवंबर 2017 को पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए समन जारी करने का आदेश निरस्त कर दिया था। इसके खिलाफ अरशद अय्यूब ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
धारा 197 के संरक्षण का दिया हवाला
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि घटना के समय संबंधित अधिकारी न्यायालय के आदेश के अनुपालन में अतिक्रमण हटाने की आधिकारिक कार्रवाई कर रहे थे। ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 के तहत लोक सेवकों को प्राप्त कानूनी संरक्षण पर विचार करना आवश्यक है।
इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी लोक सेवक पर अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान या उससे जुड़े कथित अपराध का आरोप है, तो निर्धारित परिस्थितियों में सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना अदालत संज्ञान नहीं ले सकती।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी संदर्भ दिया। अदालत के निष्कर्ष के अनुसार, आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामलों में धारा 197 के संरक्षण की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस आधार पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज कर दी और समन निरस्त करने संबंधी सत्र न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा।
महत्वपूर्ण कानूनी पक्ष: धारा 197 का संरक्षण सभी सरकारी कर्मचारियों या हर प्रकार के कथित अपराध पर स्वतः लागू नहीं होता। इसकी प्रयोज्यता संबंधित अधिकारी की श्रेणी, आरोप की प्रकृति और कथित कृत्य का आधिकारिक कर्तव्य से संबंध होने जैसे तथ्यों पर निर्भर करती है।
ADVERTISEMENTS
सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -
👉 फ़ास्ट न्यूज़ के WhatsApp ग्रुप से जुड़ें
👉 फ़ास्ट न्यूज़ के फ़ेसबुक पेज़ को लाइक करें
👉 कृपया नवीनतम समाचारों से अवगत कराएं WhatsApp 9412034119
संपादक – फास्ट न्यूज़ उत्तराखण्ड
www.fastnewsuttarakhand.com



UK-सिडकुल में दो अलग-अलग हादसे, दो कर्मचारियों की मौत -अज्ञात वाहन चालकों की तलाश में जुटी पुलिस
UKnews-भतरौजखान में गांजा तस्करों का पुलिस पर पाटल से हमला, 25 किलो गांजे के साथ तीन गिरफ्तार
स्त्री-मन की संवेदनाओं और संघर्षों को स्वर देती हैं डॉ. कविता -‘अदम्य-असीम की ओर’ का लखनऊ में लोकार्पण