“यूरिया-डीएपी का अंधाधुंध इस्तेमाल बना रहा खेतों को बंजर -वैज्ञानिकों ने किसानों को दी गंभीर चेतावनी”

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प्रयागराज (यूपी)। “धरती मां की सेहत बिगड़ी तो खेती का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा”—इसी चेतावनी भरे संदेश के साथ मोती लाल नेहरू किसान प्रशिक्षण संस्थान, फूलपुर (प्रयागराज) में सोमवार को चार दिवसीय किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। प्रशिक्षण के पहले दिन कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से होने वाले खतरों, मिट्टी संरक्षण और प्राकृतिक खेती के महत्व के बारे में जागरूक किया।

इफको के कॉपरेटिव रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट (कोरडेट) द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण 9 से 12 जून तक चलेगा। इसमें उत्तराखंड समेत विभिन्न राज्यों से आए किसान भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को आधुनिक, वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि तकनीकों से जोड़ना है।

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प्रथम सत्र में प्रधानाचार्य डॉ. डी.के. सिंह, जनसंपर्क अधिकारी संजय प्रकाश तथा प्रशिक्षण प्रभारी मुकेश तिवारी ने किसानों को प्रकृति और कृषि के गहरे संबंध की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही समृद्ध खेती की आधारशिला है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

द्वितीय सत्र में कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजेश सिंह ने प्रकृति के वैज्ञानिक सिद्धांतों और कृषि में उनकी उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने पंचतत्व सिद्धांत का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रकृति का प्रत्येक तत्व एक संतुलित चक्र में कार्य करता है और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए इस संतुलन को समझना जरूरी है।

डॉ. सिंह ने किसानों को चेतावनी देते हुए कहा कि डीएपी और यूरिया जैसे रासायनिक उर्वरकों का बिना मृदा परीक्षण के लगातार प्रयोग खेती के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इससे मिट्टी की उत्पादक क्षमता लगातार घटती है और भविष्य में भूमि बंजर होने की स्थिति तक पहुंच सकती है।

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उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड, मिट्टी के पीएच स्तर और पोषक तत्वों की उपलब्धता की जानकारी देते हुए कहा कि प्रत्येक खेत की प्रकृति अलग होती है, इसलिए उर्वरकों का प्रयोग भी वैज्ञानिक सलाह के आधार पर ही किया जाना चाहिए। साथ ही जैविक खाद, कम्पोस्ट, जैव अपघटक और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।

विशेषज्ञों ने बताया कि संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने से खेती की लागत घटती है, फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और किसानों की आय में भी वृद्धि होती है। हरी खाद, फसल चक्र और जैविक संसाधनों का उपयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति को लंबे समय तक बनाए रखने में सहायक साबित होता है।

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प्रशिक्षण के पहले दिन किसानों ने वैज्ञानिकों से सीधे संवाद कर अपनी कृषि संबंधी समस्याओं पर चर्चा की और आधुनिक खेती की नई तकनीकों की जानकारी प्राप्त की। आगामी सत्रों में किसानों को उन्नत कृषि प्रबंधन, जैविक खेती तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़े व्यावहारिक प्रशिक्षण दिए जाएंगे। इस दौरान आरती सिंह सहित तमाम प्रदेशों से आये किसान मौजूद रहे।

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