डॉ. कविता पांडेय की पुस्तक ‘अदम्या-असीम की ओर’ पर साहित्यिक परिचर्चा -शब्दों की शक्ति और कहानी कहने की कला पर विमर्श

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हल्द्वानी। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में उत्तराखंड की लेखिका डॉ. कविता पांडेय की पुस्तक ‘अदम्या-असीम की ओर’ पर साहित्यिक परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता और राजनीतिक विश्लेषण से जुड़े वक्ताओं ने साहित्य की भूमिका, शब्दों की शक्ति और कहानी कहने की कला पर विचार साझा किए।

परिचर्चा में वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, जीवनानुभवों और सामाजिक यथार्थ को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। एक प्रभावशाली रचना पाठकों को घटनाओं से परिचित कराने के साथ उन्हें अपने अनुभवों और दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है।

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कार्यक्रम में शिक्षाविद् वी.एन. राय, वरिष्ठ खेल पत्रकार जी. राजारमण, लेखक महेश दर्पण, लेखिका एवं रचनाकार विजयश्री तनवीर तथा राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार संजय पांडेय ने सहभागिता की। इसके अलावा प्रवीण शेखर, डॉ. शिशिर सोमवंशी और चित्रा पंत भी मौजूद रहे।

वक्ताओं ने पुस्तक के कथ्य, भाषा, संवेदनात्मक पक्ष और अभिव्यक्ति की प्रभावशीलता पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि कहानी कहने की कला केवल घटनाओं का क्रम प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि अनुभवों और भावनाओं को इस तरह अभिव्यक्त करना है कि पाठक उनसे जुड़ाव महसूस करे। भाषा की सहजता और कथ्य की गहराई किसी भी साहित्यिक रचना को प्रभावशाली बनाती है।

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लेखक महेश दर्पण ने अपने संबोधन में कहा कि अच्छा साहित्य वह है, जो पाठकों को चौंकाता है और उन्हें नए ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करता है। वहीं, श्री सिद्धेश्वर सिंह ने आदिवासी महिलाओं के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार पात्र महिलाओं तक इन योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता।

परिचर्चा में यह विचार भी उभरकर सामने आया कि साहित्य लेखक की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक सामाजिक और बौद्धिक संवाद का माध्यम बनता है। विभिन्न दृष्टिकोणों से किसी कृति पर चर्चा करने से उसके अर्थों और संभावनाओं को समझने के नए रास्ते खुलते हैं।

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कार्यक्रम में वक्ताओं ने रेखांकित किया कि शब्द लेखक के अनुभवों और पाठक की अनुभूतियों के बीच सेतु का काम करते हैं। जब किसी रचना का कथ्य पाठक के जीवनानुभवों से जुड़ता है, तो उसका प्रभाव अधिक व्यापक और स्थायी हो जाता है। परिचर्चा ने साहित्य की संवेदनात्मक शक्ति और समाज में संवाद स्थापित करने की उसकी भूमिका को प्रमुखता से सामने रखा।

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