आज खेत बिक रहे हैं, कल रोटी खरीदना भी हो सकता है मुश्किल

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उपजाऊ जमीन बचाना ही आने वाली पीढ़ियों की सबसे बड़ी विरासत है

लेखक: दीपक आर्या
क्षेत्र प्रबंधक, इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (IFFCO)

हल्द्वानी। आज जब गाँवों की उपजाऊ जमीनें तेजी से कॉलोनियों और प्लॉटों में बदल रही हैं, तब यह सवाल हर संवेदनशील नागरिक के मन में उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ खेती करेंगी या केवल खेतों की कहानियाँ सुनेंगी। उत्तराखंड, विशेषकर नैनीताल जनपद में खेती योग्य भूमि का लगातार सिकुड़ना केवल जमीन का बदलाव नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है।

किसानों की नई पीढ़ी खेती से दूरी बना रही है। माता-पिता भी चाहते हैं कि उनके बच्चे नौकरी करें, क्योंकि उन्हें खेती में भविष्य दिखाई नहीं देता। लेकिन सच्चाई यह है कि जिस दिन दुनिया खाद्यान्न संकट का सामना करेगी, उस दिन सबसे अधिक मूल्य उसी के पास होगा जिसके पास उपजाऊ खेत और अन्न उत्पादन की क्षमता होगी।

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आज गेहूँ, धान, दाल, फल और सब्जियों की मांग लगातार बढ़ रही है। कई सरकारी खरीद केंद्रों तक पर्याप्त अनाज नहीं पहुँच पा रहा, क्योंकि किसानों का पूरा उत्पादन सीधे बाजार में बिक रहा है। यह संकेत है कि आने वाले समय में कृषि केवल जीविका नहीं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण और लाभकारी व्यवसायों में शामिल होगी।

कुछ वर्षों की आर्थिक सुविधा के लिए खेत बेच देना भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी खो देना है। धन दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन उपजाऊ मिट्टी तैयार होने में सदियाँ लग जाती हैं। इसलिए खेती योग्य भूमि का संरक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

खेती की एक और बड़ी चुनौती लगातार एक ही फसल उगाने की प्रवृत्ति है। नैनीताल के ओखलकांडा सहित कई क्षेत्रों में वर्षों तक लगातार चेरी टमाटर जैसी एक ही परिवार की फसल लेने से फ्यूजेरियम विल्ट जैसी गंभीर बीमारियों ने खेतों को प्रभावित किया है। लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी किसान इस समस्या से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।

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इसका सबसे प्रभावी समाधान फसल चक्र (क्रॉप रोटेशन) अपनाना है। एक या दो वर्षों तक अलग परिवार की फसलें लेने से मिट्टी में मौजूद रोगों का जीवन चक्र टूटता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और उत्पादन भी बेहतर होता है। प्रकृति संतुलन चाहती है और खेती में भी यही सिद्धांत सबसे अधिक सफल साबित होता है।

भविष्य में हाइड्रोपोनिक्स, वर्टिकल फार्मिंग और टिशू कल्चर जैसी आधुनिक तकनीकों का महत्व बढ़ेगा, लेकिन इन सबके बावजूद उपजाऊ मिट्टी का कोई विकल्प नहीं है। मिट्टी केवल पौधों को सहारा नहीं देती, बल्कि अपने भीतर मौजूद सूक्ष्मजीवों, जैविक पदार्थों और पोषक तत्वों के माध्यम से जीवन प्रदान करती है। यदि मिट्टी कमजोर होगी तो भोजन भी कमजोर होगा और उसका सीधा असर समाज के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।

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आज आवश्यकता इस बात की है कि किसान वैज्ञानिक खेती अपनाएँ, फसल चक्र का पालन करें, जैविक पदार्थों से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाएँ और किसी भी परिस्थिति में अपनी खेती योग्य भूमि को सुरक्षित रखें। युवाओं को भी समझना होगा कि कृषि केवल परंपरा नहीं, बल्कि भविष्य का सबसे बड़ा अवसर है।

यदि आज भी हम नहीं जागे, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे पूछेंगे—“दादाजी, क्या सचमुच कभी इतने बड़े-बड़े खेत हुआ करते थे?” उस दिन हमारे पास उत्तर तो होगा, लेकिन खेत नहीं होंगे।

याद रखिए…

“सोना, चाँदी और पैसा भूख नहीं मिटाते। भूख केवल खेत मिटाते हैं। इसलिए खेत बचाइए, किसान बचाइए और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचाइए।”

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