सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : पीसीपीएनडीटी कानून में पुलिस की जांच पर लगी रोक

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 यानी पीसीपीएनडीटी कानून के तहत मामलों की जांच को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत भ्रूण के लिंग का पता लगाने या लिंग चयन से जुड़े अपराधों की मुख्य जांच पुलिस नहीं कर सकती।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम तकनीकी और संवेदनशील प्रकृति के मामलों से संबंधित है। इसलिए कानून के तहत अधिकृत प्राधिकरण को ही ऐसे मामलों में शिकायत दर्ज कराने और जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 17(4) के तहत अधिकृत प्राधिकरण को कार्रवाई का अधिकार दिया गया है। ऐसे में पुलिस को इस कानून के तहत मुख्य जांचकर्ता नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण से भी सहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि पुलिस पीसीपीएनडीटी अधिनियम के उल्लंघन की जांच अथवा इस कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकती।

जरूरत पड़ने पर पुलिस दे सकेगी सहायता

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। यदि अधिकृत प्राधिकरण को किसी कार्रवाई के दौरान पुलिस की सहायता की आवश्यकता होती है, तो पुलिस सीमित और सहायक भूमिका निभा सकती है। लेकिन कानून के तहत मुख्य जांच एजेंसी पुलिस नहीं होगी।

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस की जांच पर यह रोक केवल पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत आने वाले अपराधों तक सीमित है। यदि किसी मामले में भारतीय दंड कानून या किसी अन्य लागू कानून के तहत अलग अपराध बनता है, तो पुलिस उस अपराध की जांच और कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

कन्या भ्रूण हत्या पर रोक के लिए बनाया गया कानून

पीसीपीएनडीटी अधिनियम का उद्देश्य गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन तथा भ्रूण के लिंग का पता लगाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना है। इसका प्रमुख उद्देश्य प्रसव पूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना और कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक बुराई पर अंकुश लगाना है।

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सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत जांच की जिम्मेदारी को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है। अब ऐसे मामलों में अधिकृत प्राधिकरण मुख्य भूमिका निभाएगा, जबकि जरूरत पड़ने पर पुलिस केवल सहायता प्रदान करेगी।

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