डिजिटल अरेस्ट में ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त -लापरवाही पर बैंकों से मुआवजे पर विचार

खबर शेयर करें 👉

नई दिल्ली। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर हो रही साइबर ठगी के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि यदि वित्तीय संस्थानों की जांच-पड़ताल में लापरवाही के कारण धोखाधड़ी होती है, तो पीड़ितों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए बैंकों की जवाबदेही तय करने पर विचार किया जाना चाहिए।

पीठ ने सुझाव दिया कि वित्तीय संस्थानों के दायित्वों में विफलता के कारण साइबर ठगी होने पर पीड़ितों को ठगी गई रकम के बराबर मुआवजा देने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। अदालत ने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से इस संबंध में उठाए जा रहे कदमों की जानकारी भी मांगी है।

सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के ग्राहक पहचान संबंधी संशोधित दिशा-निर्देशों की समीक्षा करने की बात कही। साथ ही केंद्रीय बैंक से उन बैंकों और अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची प्रस्तुत करने को कहा, जिन्हें डिजिटल अरेस्ट से जुड़ी धोखाधड़ी रोकने के लिए निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा। अदालत ने बैंकों की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि संदिग्ध लेन-देन की जानकारी पुलिस को देना भी उनकी जवाबदेही का हिस्सा है।

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  UPNews-प्रयागराज में जमीन के नीचे दबे मिले तीन ड्रम -पुलिस ने बरामद किए पांच करोड़ रुपये

केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि बैंकों की जिम्मेदारी तय करने और इस संबंध में नियम बनाने का विषय आरबीआई के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके बाद पीठ ने केंद्रीय बैंक से अगली सुनवाई पर अपना पक्ष रखने और पीड़ितों को मुआवजा देने की प्रभावी व्यवस्था पर विचार करने को कहा।

म्यूल खातों पर भी सख्ती की जरूरत

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  सुरेश चंद्र आर्य बने नैनीताल के मुख्य शिक्षा अधिकारी, शिक्षकों ने किया स्वागत

सुनवाई के दौरान साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले म्यूल खातों का मुद्दा भी उठा। इन बैंक खातों के माध्यम से ठगी की रकम प्राप्त कर दूसरे खातों में स्थानांतरित की जाती है। कई मामलों में खाताधारकों की जानकारी या मिलीभगत से ऐसे खाते इस्तेमाल होते हैं, जबकि कुछ लोग अनजाने में ठगों के जाल में फंस जाते हैं। अदालत ने ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के तहत कड़ी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।

क्या है डिजिटल अरेस्ट?

डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, अदालत या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ या गिरफ्तारी का माहौल बनाकर पीड़ित पर मानसिक दबाव डाला जाता है। इसके बाद जांच के नाम पर उससे बैंक खाते में रकम जमा कराने या दूसरे खातों में पैसे भेजने को कहा जाता है।

फ़ास्ट न्यूज़ 👉  UK-चम्पावत में नाबालिग से छेड़छाड़ के दोषी को पांच साल की सजा -47 हजार रुपये जुर्माना

फिलहाल बैंक से पैसा लौटाने का स्वतः लागू नियम नहीं

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां बैंकों की जवाबदेही और मुआवजे की व्यवस्था पर विचार से संबंधित हैं। इन्हें ऐसा अंतिम आदेश नहीं माना जाना चाहिए, जिसके तहत डिजिटल अरेस्ट में ठगी गई हर रकम बैंक को लौटानी ही होगी। मुआवजा किन परिस्थितियों में मिलेगा, यह संबंधित नियमों और आगे होने वाले न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करेगा।

अदालत की इस पहल से साइबर ठगी के पीड़ितों को राहत मिलने की उम्मीद है। साथ ही बैंकों की निगरानी व्यवस्था, संदिग्ध लेन-देन की समय पर सूचना और म्यूल खातों पर नियंत्रण को लेकर भी सख्ती बढ़ सकती है।

ADVERTISEMENTS

Ad Ad
सबसे पहले ख़बरें पाने के लिए -

👉 फ़ास्ट न्यूज़ के WhatsApp ग्रुप से जुड़ें

👉 फ़ास्ट न्यूज़ के फ़ेसबुक पेज़ को लाइक करें

👉 कृपया नवीनतम समाचारों से अवगत कराएं WhatsApp 9412034119