साक्ष्यों के अभाव में युवक बरी: पोक्सो कोर्ट ने कहा—पीड़िता की उम्र व बयानों में संदेह, सहमति की बात भी आई सामने

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देहरादून। अपहरण, दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट के आरोपों का सामना कर रहे एक युवक को पोक्सो अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया। पोक्सो कोर्ट की जज रजनी शुक्ला की अदालत ने यह फैसला सुनाया।


बचाव पक्ष के अधिवक्ता आशुतोष गुलाटी के अनुसार, पटेलनगर कोतवाली में 28 फरवरी 2019 को एक पिता ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उनकी बेटी को राजमिस्त्री का काम करने वाला मलिक चंद भगा ले गया है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर नाबालिग के अपहरण, दुष्कर्म और एससी-एसटी एक्ट के तहत उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी।

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अदालत ने अपने 18 पेज के फैसले में कहा कि अभियोजन घटना के समय पीड़िता के नाबालिग होने को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। आयु निर्धारण के लिए हुए मेडिकल परीक्षण में पीड़िता की उम्र 15 से 17 वर्ष बताई गई थी। अदालत ने विधिक प्रावधानों का हवाला देते हुए माना कि मेडिकल आयु निर्धारण में 1-2 वर्ष का अंतर संभव होता है, जिससे घटना के समय पीड़िता के बालिग होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पाया कि पीड़िता के बयानों में विरोधाभास था। जिरह के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कि आरोपी उसे बहला-फुसलाकर नहीं ले गया था। मेडिकल परीक्षण के समय भी उसने डॉक्टर को बताया था कि आरोपी के साथ बने शारीरिक संबंध उसकी सहमति से थे और उसने आरोपी को अपना बॉयफ्रेंड बताया था। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में आरोपी को दोषमुक्त करार दे दिया।

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