uttarakhand-बनभूलपुरा रेलवे भूमि विवाद : दो दशक से अदालतों में मामला, नौ सितंबर की सुनवाई पर टिकी नजर

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हल्द्वानी। बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि पर कथित अतिक्रमण का विवाद करीब दो दशक से न्यायालयों में लंबित है। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया है कि क्षेत्र में कई परिवार लंबे समय से रह रहे हैं। कई परिवारों के नाम स्थानीय निकायों के अभिलेखों में दर्ज रहे हैं और उनके द्वारा कर अथवा अन्य स्थानीय देनदारियों का भुगतान भी किया जाता रहा है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दशकों से बसे लोगों को अचानक बेदखल करना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि यदि विस्थापन की स्थिति बनती है तो प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

मकानों के साथ स्कूल और सामाजिक सुविधाओं का भी सवाल

विवादित क्षेत्र में केवल आवासीय मकान ही नहीं हैं, बल्कि लंबे समय में स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य सामाजिक संरचनाएं भी विकसित हुई हैं। ऐसे में मामला महज रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रह गया है।

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सुप्रीम कोर्ट के सामने अहम सवाल यह भी है कि यदि भूमि रेलवे की है और वहां किया गया कब्जा अवैध पाया जाता है, तो दशकों से रह रहे परिवारों के विस्थापन से उत्पन्न सामाजिक समस्या का समाधान किस तरह किया जाए।

2007 से अदालतों में चल रहा विवाद

इस विवाद का इतिहास वर्ष 2007 तक जाता है। याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी के अनुसार, बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर उस समय भी मामला हाईकोर्ट पहुंचा था और कुछ भूमि अतिक्रमणमुक्त कराई गई थी।

बाद में गौला नदी में अवैध खनन और गौला पुल से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा दोबारा सामने आया। नौ नवंबर 2016 को हाईकोर्ट ने रेलवे को निर्धारित अवधि में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए।

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इसके बाद विवादित भूमि को नजूल भूमि बताए जाने की दलील भी सामने आई, लेकिन जनवरी 2017 में हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

आदेश के बावजूद खाली नहीं हुई जमीन

वर्ष 2017 में भी न्यायालय ने रेलवे भूमि से अनधिकृत अधिभोगियों को हटाने के लिए संबंधित कानून के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए। हालांकि, इसके बावजूद जमीन खाली कराने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में अवमानना याचिका भी दाखिल की गई।

रेलवे और जिला प्रशासन ने न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा, लेकिन विवाद का स्थायी समाधान नहीं हो सका। 21 मार्च 2022 को एक अन्य जनहित याचिका के माध्यम से रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने में कथित देरी का मुद्दा उठाया गया। मई 2022 में हाईकोर्ट ने प्रभावित लोगों को अपने तथ्य और पक्ष रखने का अवसर दिया।

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दिसंबर 2022 में हाईकोर्ट ने एक बार फिर अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी कर भूमि खाली कराने की दिशा में कदम बढ़ाया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

9 सितंबर की सुनवाई पर टिकी निगाहें

करीब दो दशक से न्यायालयों में चल रहे इस विवाद में अब 9 सितंबर की सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि इस दिन मामले में कोई महत्वपूर्ण या अंतिम आदेश आता है तो उसका सीधा असर रेलवे भूमि पर बसे प्रभावित परिवारों और प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर पड़ सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामले में आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी। फिलहाल प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्क है, जबकि सरकार भी अपनी कानूनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुटी है।

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