मॉडल सहकारिता गांव का ऐलान : हकीकत बनेगा या फिर एक और कागजी सपना?

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देहरादून। प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को नई दिशा देने के नाम पर हर जनपद में “मॉडल सहकारिता गांव” स्थापित करने की घोषणा तो कर दी गई है, लेकिन इस पहल की सफलता को लेकर शुरू से ही सवाल उठने लगे हैं।


सहकारिता मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने विभागीय अधिकारियों को जल्द रोडमैप तैयार करने के निर्देश दिए हैं। योजना के तहत सहकारी बैंक, सीएससी सेंटर और सहकारी बाजार स्थापित किए जाने की बात कही गई है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश की कई सहकारी समितियां पहले से ही संसाधनों और प्रबंधन की कमी से जूझ रही हैं।

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सरकार का दावा है कि सहकारी बाजार के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों और किसानों को मजबूत मंच मिलेगा, मगर सवाल यह है कि जब मौजूदा ढांचा ही कमजोर है तो नए मॉडल को सफल कैसे बनाया जाएगा?


बैठक में 50 सचिवों को गुजरात भेजने का निर्णय भी लिया गया है। हालांकि, इसे लेकर यह सवाल उठ रहा है कि क्या अध्ययन भ्रमण से ज्यादा जरूरी प्रदेश के भीतर ही व्यवस्थाओं को दुरुस्त करना नहीं है? कई समितियां वर्षों से घाटे में चल रही हैं, लेकिन सुधार की दिशा में ठोस परिणाम अब तक नजर नहीं आए हैं।

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मंत्री ने होली के बाद ब्लॉक स्तर पर समीक्षा बैठकों के निर्देश जरूर दिए हैं, लेकिन पिछले अनुभवों को देखते हुए यह आशंका भी जताई जा रही है कि कहीं ये बैठकें केवल औपचारिकता बनकर न रह जाएं।


भर्ती प्रक्रिया को Institute of Banking Personnel Selection (IBPS) के माध्यम से पारदर्शी बनाने और 15 मार्च तक विज्ञापन जारी करने की बात कही गई है, लेकिन प्रदेश में लंबित भर्तियों का रिकॉर्ड इस दावे पर भी सवाल खड़े करता है।

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सरकार सोशल मीडिया के जरिए योजनाओं के प्रचार-प्रसार पर जोर दे रही है, मगर विशेषज्ञों का मानना है कि असली चुनौती प्रचार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सहकारिता तंत्र को मजबूत करना है।


अब नजर इस बात पर रहेगी कि “मॉडल सहकारिता गांव” की यह घोषणा वाकई ग्रामीण विकास की मिसाल बनेगी या फिर एक और योजना की तरह कागजों तक सीमित रह जाएगी।

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