बिग ब्रेकिंग : सहमति से बने संबंध को दुष्कर्म नहीं मान सकते: हाईकोर्ट

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नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फौज में कार्यरत एक जवान के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और अपहरण के मुकदमे को रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि यदि दो वयस्कों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने हों, तो बाद में शादी से इनकार करना स्वतः ही दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।


न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रतिशोध या असफल रिश्तों को सुलझाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।


📌 मामला क्या था
यह मामला पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2022 में एक युवती ने गुरपाल सिंह नामक युवक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर युवती को घर से बाहर बुलाया और होटल में ले जाकर शारीरिक संबंध बनाए। बाद में शादी से इनकार करने पर युवती ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366 (अपहरण) और 376 (दुष्कर्म) के तहत मुकदमा दर्ज कराया।

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🔎 अदालत की पड़ताल में क्या आया सामने
सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी दस्तावेजों और पीड़िता के बयानों का गहन अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि दोनों पक्ष वर्ष 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क में थे।
अदालत ने यह भी माना कि युवती अपनी मर्जी से घर छोड़कर आरोपी के साथ गई थी। ऐसे में अपहरण की धारा 366 के आवश्यक तत्व इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि युवती वयस्क थी और उसने स्वयं निर्णय लिया था।

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⚖️ दुष्कर्म के आरोप पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायालय ने कहा कि शादी के वादे पर बने यौन संबंध तभी दुष्कर्म माने जाएंगे, जब यह साबित हो कि आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखा देने की थी।
इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य सामने नहीं आया जिससे यह सिद्ध हो कि आरोपी ने प्रारंभ से ही शादी न करने का इरादा रखा था। अदालत ने कहा कि एक असफल संबंध और आपराधिक धोखाधड़ी के बीच स्पष्ट अंतर होता है।


🧾 मेडिकल रिपोर्ट ने भी नहीं किया पुष्टि
सुनवाई के दौरान 23 फरवरी 2022 की पूरक मेडिकल रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया। रिपोर्ट में जबरन यौन शोषण या बल प्रयोग की पुष्टि नहीं हुई।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं था, जिससे प्रथम दृष्टया दुष्कर्म का अपराध सिद्ध किया जा सके।

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🚫 कानून के दुरुपयोग पर सख्त रुख
हाईकोर्ट ने कहा कि जहाँ आरोप पूरी तरह निराधार हों, वहाँ आरोपी को लंबी आपराधिक प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर करना कानून का दुरुपयोग होगा।
अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए कहा कि न्याय सुनिश्चित करने और अनावश्यक उत्पीड़न रोकने के लिए ऐसे मामलों में हस्तक्षेप आवश्यक है।

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