नियमित भर्ती न करने पर हाईकोर्ट सख्त, आउटसोर्सिंग को बताया शोषणकारी -खाली पदों के बावजूद युवाओं को ‘ओवर एज’ करने पर सरकार से मांगा जवाब

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नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों में स्वीकृत पद खाली होने के बावजूद नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू न करने पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका के दायरे का विस्तार कर दिया है।


कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक ओर प्रदेश का युवा सरकारी नौकरियों के इंतजार में ‘ओवर एज’ होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार नियमित नियुक्तियां करने के बजाय आउटसोर्सिंग और अस्थायी व्यवस्था के सहारे काम चला रही है। अदालत ने इस प्रवृत्ति को पूरी तरह शोषणकारी और तर्कहीन करार दिया।

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पीठ ने टिप्पणी की कि स्वीकृत एवं रिक्त पदों पर ठेका या आउटसोर्स माध्यम से नियुक्तियां करना न केवल युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन भी है। कोर्ट ने इसे राज्य सरकार की गंभीर निष्क्रियता बताया।


सुनवाई के दौरान न्यायालय ने चतुर्थ श्रेणी पदों को ‘डाइंग कैडर’ (समाप्त होने वाला संवर्ग) घोषित किए जाने पर भी कड़े सवाल उठाए। कोर्ट ने संज्ञान लिया कि उत्तर प्रदेश की जिस नीति के आधार पर उत्तराखंड में इन पदों को समाप्त किया जा रहा है, उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है। ऐसे में इन पदों को खत्म करना युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बंद करने जैसा है।

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हाईकोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे सभी विभागों के सचिवों से रिक्त पदों का पूरा ब्योरा एकत्र कर विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करें। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि जब पद स्वीकृत हैं, तो उन पर नियमित भर्ती क्यों नहीं की जा रही और क्यों आउटसोर्स या दैनिक वेतनभोगियों के माध्यम से नियुक्तियां की जा रही हैं।

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इस अहम मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी 2026 को होगी। कोर्ट ने साफ किया है कि वह इस मुद्दे की तह तक जाएगा, ताकि योग्य युवाओं को उनका संवैधानिक अधिकार मिल सके और प्रदेश में नियमित भर्तियों का रास्ता प्रशस्त हो।

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