498A को बदले की तलवार नहीं बना सकते – सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न केस में ससुराल वालों को दी बड़ी राहत

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामलों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पति के रिश्तेदारों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ससुराल पक्ष के खिलाफ कार्रवाई के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं।

जस्टिस और जस्टिस की बेंच ने मध्य प्रदेश के गुना जिले से जुड़े दहेज उत्पीड़न और आईपीसी की धारा 498ए के मामले में ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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गुना की महिला ने लगाए थे गंभीर आरोप

मामला मध्य प्रदेश के गुना का है। महिला की शादी नवंबर 2019 में हुई थी। उसने जनवरी 2023 में अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि शादी में भारी मात्रा में नकदी, गहने और घरेलू सामान दिए जाने के बावजूद उससे अतिरिक्त दहेज की मांग की गई और उसे मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

महिला ने आरोप लगाया कि ससुराल पक्ष उस पर निगरानी रखने के लिए कैमरे लगाता था, उसके आने-जाने पर रोक लगाई गई और उसे लाइसेंसी बंदूक से धमकाया भी गया। शिकायत के आधार पर आईपीसी की धारा 498ए, धारा 34 और दहेज प्रतिषेध कानून की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया था।

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हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत

जब मामला की ग्वालियर बेंच पहुंचा, तब हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था कि प्रथम दृष्टया रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप बनते हैं। इसके बाद ससुराल वालों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

“पूरे परिवार को आरोपी बनाना गलत”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में अक्सर गुस्से और कटुता के चलते पति के पूरे परिवार को आरोपी बना दिया जाता है। अदालत ने कहा कि केवल पति का समर्थन करना या पति-पत्नी के बीच समझौते की सलाह देना किसी रिश्तेदार को अपराधी नहीं बनाता।

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शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों को भी चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में बेहद सावधानी बरती जाए और बिना ठोस साक्ष्यों के रिश्तेदारों को मुकदमों में न घसीटा जाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कानून का इस्तेमाल “हथियार” की तरह नहीं किया जा सकता।

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