जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति की कथित अव्यवस्थाओं को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर
अल्मोड़ा। जागेश्वर धाम मंदिर प्रबंधन समिति में व्याप्त कथित अव्यवस्थाओं, पारदर्शिता की कमी और नियमों के उल्लंघन को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट में गुरुवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की गई है। याचिका में समिति का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से ऑडिट कराए जाने, सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत जानकारी उपलब्ध कराने सहित कई अहम मुद्दे उठाए गए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार रमेश जोशी द्वारा दाखिल इस पीआईएल में उत्तराखंड सरकार, जिलाधिकारी अल्मोड़ा, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के महानिदेशक और जागेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी को पक्षकार बनाया गया है। याचिका हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अधिवक्ता विनोद तिवारी, प्रभाकर जोशी और रक्षित जोशी के माध्यम से दायर की गई।
उल्लेखनीय है कि जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति का गठन वर्ष 2013 में नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश पर किया गया था। उस समय अखबार में प्रकाशित एक खबर पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने समिति के गठन का निर्देश दिया था, ताकि मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता लाई जा सके।
पांच सदस्यीय इस समिति में जिलाधिकारी अल्मोड़ा पदेन अध्यक्ष होते हैं, जबकि क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी को सदस्य के रूप में नामित किया गया है। समिति में उपाध्यक्ष (अवैतनिक) और प्रबंधक (वैतनिक) का चयन राज्यपाल द्वारा किया जाता है। वहीं, पंजीकृत पुजारी मतदान के जरिए अपने प्रतिनिधि का चयन करते हैं। उपाध्यक्ष, प्रबंधक और पुजारी प्रतिनिधि का कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित है।
याचिका में बताया गया है कि मंदिर प्रबंधन समिति में प्रबंधक का पद पिछले करीब 15 महीनों से खाली है, जबकि उपाध्यक्ष का पद भी लगभग चार माह से रिक्त चल रहा है। इसके अलावा पुजारी प्रतिनिधि का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है, लेकिन अब तक नया चयन नहीं किया गया है। समिति में समय-समय पर राजनीतिक दखल के आरोप भी लगते रहे हैं।
पीआईएल में यह भी आरोप लगाया गया है कि बोर्ड बैठक में प्रस्ताव पारित होने के बावजूद जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति को अब तक आरटीआई के दायरे में नहीं लाया गया है। जिला प्रशासन भी सरकारी स्तर से इस समिति से संबंधित आरटीआई आवेदनों पर जानकारी उपलब्ध नहीं करा रहा है।
गठन के बाद से अब तक नहीं हुआ सीएजी ऑडिट
याचिका में यह महत्वपूर्ण बिंदु भी उठाया गया है कि गठन के समय हाईकोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को मंदिर समिति का ऑडिट सीएजी से कराने के निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक एक बार भी सीएजी ऑडिट नहीं कराया गया। इसके बजाय, प्रबंधक अपने तीन वर्षीय कार्यकाल के दौरान निजी स्तर पर चार्टर्ड अकाउंटेंट का चयन कर ऑडिट कराते रहे हैं।
इसके साथ ही, उपाध्यक्ष के अधिकार नियमों के विपरीत सरकारी अधिकारियों को सौंपे जाने का भी आरोप लगाया गया है। इसी कारण अब उपाध्यक्ष पद के लिए लोग आवेदन करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं। हाईकोर्ट में दायर इस जनहित याचिका पर शीघ्र सुनवाई की संभावना है।
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संपादक – फास्ट न्यूज़ उत्तराखण्ड
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